Tuesday, March 17, 2020

Pain को दें थोड़ी मोहलत

right think in pain


किसी भी शारीरिक pain के साथ जीना एक चुनौती है। मैं इसे पूरी
 तरह से समझती हूँ। 2007 में, मैं Thoracic outlet syndrome की
 चपेट में आ गई थी। यह बेहद दर्दनाक स्थिति होती है। इसमे 
coller-bone और पसलियों के बीच की मांसपेशियों, शिराएँ और धमनियां
 संकुचित होने लगती है। 
फिर भी, जैसा कि ज्यादातर हम सभी करते हैं, मुझे विश्वास था कि मेरी 
हालत जल्द ही ठीक हो जाएगी। pain दूर हो जायेगा। प्राय: शारीरिक 
बीमारियों में यही होता है। पहले pain शुरू होता है और कुछ दिनों या 
हफ़्तों में वह ठीक हो जाता है। इस बीच हम pain या बेचैनी को कम 
करने के लिए कुछ medicine खा सकते है, कुछ उपाय कर सकते है। 
लेकिन अगर pain जड़ जमा ले और किसी चीज से ठीक न हो, तब हमें क्या करना चाहिए? स्वाभाविक
 जवाब होगा कि उससे निपटने का उपाय करना चाहिए। यानी रोज-रोज का संघर्ष। सटीक medicine 
और कारगर उपचार की तलाश। एक के बाद दूसरी medicine को आजमाना। अगर कोई भी चीज काम 
न करे तो अंततः एक सुबह जगने पर हमें पता चलता है कि pain से लड़ने के लिए अब हमारे पास कोई
 हथियार नही बचा है। ऐसे में हम बिलकुल छोर पर पहुंच जाते है। हम तय करते हैं कि अपने pain की
 अनदेखी करेंगे, हमें इसके साथ ही रहना होगा। फिर हम मुस्कराने की कोशिश करते है। pain को 
नजरअंदाज करते है। किस्मित या शरीर को दोष देने लगते है। पर pain जमा रहता है, कायम रहता 
है। 
pain से लड़ना थका देने वाला होता है। यह tension पैदा करता है, जो दर्द को ठीक करने की राह में
 बाधा होता है। लम्बा pain, समय के साथ असहायता और निराशा को जन्म दे सकता है। अगर pain
 में सुधार न हो तो व्यक्ति खुद को किसी अँधेरे कुए में पाता है। 
ऐसे में क्या कोई बीच का रास्ता नही है, जो pain से लगातार लड़ने के मुकाबले कुछ कम थकाने 
वाला और कम निराश करने वाला हो? मैंने दोनों स्थितियों के बीच बरसों गुजारे। तब, मैंने उस रास्ते
 को चुना, जहाँ दर्द के बीच भी अधिक सहजता और अनुग्रह के साथ रहा जा सकता था। इसलिए 
pain के बारे में अपनी धारणा को बदलने की कोशिश की। मैंने pain को महसूस करने और उस पर 
प्रतिक्रिया देने के अपने तरीके को बदल दिया। इससे मुझे pain के साथ अपने रिश्ते को और अधिक
 positive रचनात्मक बनाने के तरीके मिल गये। आखिरकार, मुझे कुछ राहत का अनुभव हुआ। मैंने 
तीन तरीके से pain के साथ अपने relation में बदलाव किया। ये तरीके थे-

दर्द से दोस्ती

इसने मुझे यह समझने में बहुत मदद की कि pain कोई दुश्मन नही है। यह एक संकेत और सन्देश
 है, जो हमें बताता है कि body खुद को ठीक करने की कोशिश कर रहा है। pain अंदर की आवाज़ 
है, जो बताती है कि वहां कुछ तालमेल बिगड़ गया है, जिसको सही रखने की कोशिश की जा रही है। 
pain को यातना मानने की बजाय, मैं उसे अपने body का स्वाभाविक संचार समझने लगी। मैंने खुद
 से पूछा, अगर यह प्रतिकूल की बजाय, किसी positive मकसद से हुआ तो, अगर यह body के किसी
 हिस्से की ओर ध्यान दिलाने के लिए हुआ तो, तब मैंने pain से पूछना शुरू किया कि वह क्या चाहता
 है। मैं अपने body की सहायता के लिए उसको क्या दे सकती हूँ और क्या कर सकती हूँ। मुझे समझ 
में आया कि वह मुझे अंदर और बाहर दोनों जगह थोड़ा धीमा होने के लिए कह रहा था। मैंने सीखा कि
 pain पर गुस्सा या नफरत की बजाय उस पर अलग तरीके से ध्यान देने की जरूरत थी। जब मैंने उसे
 सुनने, उसका सम्मान करने और दयालु होने की कोशिश की तो मेरा tension और pain कम होने 
लगा। 

सही तरीकों की तलाश

मैंने pain के साथ जीने के बारे में diary लिखनी शुरू की, जिसने मुझे इस अलग तरह से देखने में 
मदद की। मैंने दर्द के साथ जीने की अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बारे में लिखा। मैंने नुकसान 
और अकेलेपन, शर्म और हताशा के बारे में लिखा। फिर मैंने दर्द के बारे में और खुद के बारे में अपने 
लिखे को जोर से पढ़ा। इससे हम दोनों ने सुन लिया और हम दोनों ने आराम किया। दर्द ने जाना शुरू
 कर दिया। 
मैं तब एक कदम और आगे बढ़ी। मैंने ऐसे एक व्यक्ति को अपने दर्द सुनाया, जो मुझ पर भरोसा कर 
सकता था। मैंने उससे कहा कि वह कोई सलाह न दे। सिर्फ खुले दिल से मेरी बातें सुने। मैंने उसे अपने
 दुःख और भय, अकेलेपन और शर्म के बारे में बताया। मैंने उसे ऐसी बातें बताई, जो मैंने कभी किसी 
को नही बताई थी, क्योंकि मैं इन सभी चीजों को एक साथ रखने की कोशिश कर रही थी। कोई बिना 
कुछ पूछें या सुझाये आपको pain का साक्षी बनता है और मानता है कि आप तकलीफ में हैं तो यह 
बात बहुत राहत देती है। 

थोडा समय चाहिए

मैंने यह भी पाया कि pain अपने लिए मोहलत मांग रहा था। मेरी जल्दबाजी के कारण body ने सही
 reaction नही दी। pain की अपनी खुद की समय सारिणी थी। pain को ठीक होने के लिए उसे समय
 देना body से हमारे रिश्ते को बेहतर बनाने में मदद करता है। ऐसा करना उपचार के लिए अधिक
 अनुकूल था। ऐसा करने के बाद मैंने और अधिक अनुकूल था। ऐसा करने के बाद मैंने और अधिक 
स्वतंत्र रूप से सांस ली। हर चीज अधिक आराम की मुद्रा में आ गई और मैं उपचार को लेकर अपने 
जूनून को control कर सकी।
मैंने दर्द के खिलाफ जोर देना बंद कर दिया और चिकित्सा प्रक्रिया पर भरोसा करना बंद कर दिया।
 हैरतअंगेज रूप से मुझे आराम आराम मिलने लगा। जब मैंने उससे तत्काल दूर जाने की अपेक्षा की,
 तब वह बढ़ गया। लेकिन जब मैंने उसे धैर्य व् प्यार से संबोधित किया, तब मुझे जल्दी राहत महसूस 
होने लगी। आखिर में, मैंने यही पाया कि यह दृष्टिकोण पुराने pain से राहत दिलाने में कारगर है।
 इनमें से कोई भी नजरिया pain से पूरी तरह मुक्ति की गारंटी नही है, लेकिन ये राहत, आशा और 
सही बदलाव की पेशकश लगभग तुरंत कर सकते है। लम्बे समय से pain के साथ रह रहे लोग जानते 
है कि दर्द से राहत का एक छोटा सा उपाय भी उनके लिए किसी बड़े उत्सव से कम अहमियत नही 
रखता है। 
दर्द समय के साथ किसी आध्यात्मिक गुरु जैसा कुछ बन जाता है। इसने मुझे सिखाया है कि कैसे 
अधिक गहराई से, अधिक सहज होकर जीना है। दर्द के साथ रहने से मुझे यह समझने में मदद मिली 
कि life में मेरे लिए क्या important है। 
 
 
# इस article की writer सारा एनी शोकन है, जो writer, education film director और नियमित 
स्तंभकार। वह Thoracic outlet syndrome  का सामना कर रही है। ‘The pain companion’ नाम
 से book भी आ चुकी है। 



Tags:  दूसरों को खुद में देखना ही सच्चा प्रेम    गर हो खुद पर विश्वास




Tuesday, March 3, 2020

गर हो खुद पर विश्वास

self respect and love


आत्म-सम्मान कहें, आत्म-प्रेम या फिर आत्म-मूल्य। इसकी शुरुआत इस सोच के साथ होती है कि आप प्यार करने के लायक है; खुद से प्यार करने के लायक है। सच यही है कि life में हम ज्यादातर जिन चीजों से लड़ते हैं, उनमें से एक अपने प्रति ईमानदार होना भी है। अतीत की ठेस को हम छिपाना पसंद करते हैं, ताकि फिर से चोट पहुंचने से खुद को बचा सकें। खुद से प्यार करने की वकालत करने की एक बड़ी वजह यही है कि जब हम ऐसा करना शुरू करते हैं, तो हम ऐसी सोच पैदा करने लगते है, जो हमें खुद के प्रति ईमानदार होने के करीब लाती है। जाहिर है, यदि आप दूसरों को महज खुश करने के लिए कुछ कर रहे है, या बातें बना रहे है, तो यकीनन आप अपने होने का उद्देश्य को नकार रहे है। खुद को ख़ुशी से वंचित कर रहे है। खुद से प्यार करके ही पता चलता है कि आप कौन है?

खुद पर भरोसा करना शुरू करें

कई बार हम खुद के प्रति अनिश्चित होते है। अपने decision की आलोचना करते रहते है या फिर अपने आसपास मौजूद अन्य लोगों की राय पर फैसले तय करने लगते है। खुद पर भरोसा करने की बजाय हम दूसरों पर यह विश्वास आखिर क्यों करते है? हमें नही भूलना चाहिए कि हमारा मानस भी अद्धितीय है, सुन्दर है। एक ऐसी दुनिया में, जहां किसी को आंकने या दूसरों से तुलना करने की इतनी जल्दबाजी हो, वहाँ सच्चे आत्म को दबाना आसान हो सकता है। हम अपनी संस्कृति या माता-पिता से यह सीखते है और लगातार खुद को आंकना शुरू कर देते है। यह एक खुशहाल life का तरीका कतई नही है। इससे हम अनवरत किसी ऐसी चीज का पीछा कर रहे होंगे, जो हमारे खास होने को झुठलाती है।

अपने प्रति ईमानदार होने के लाभ

आत्म-सम्मान के निर्माण का कोई सही या गलत तरीका नही होता है। इसमें अन्दर का बचपन मार्गदर्शक का काम करता है। उस पर विश्वास करें। खुद से प्यार करें और उस रूप के प्रति सच्चे रहें, जो आपका सर्वश्रेष्ठ है। स्वयं के प्रति सच्चा होना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो हम रोजाना करते है। और यह कतई न सोचें कि चूँकि अपनी गलती की है, इसलिए आप unsuccessful है। life एक experience है, जो हमे daily सिखाता रहता है, कभी-कभी हम सही decision लेते है, तो कभी नही। इससे मायूस नही होना चाहिए, क्योंकि हम इससे सीख रहे होते है। गलत चर्चाओं को अपने उपर हावी न होने दे और खुद पर भरोसा रखें। जब आप ऐसा करते है, तो आपको अपने अन्दर कई तरह के बड़े बदलाव दिखेंगे। जैसे-

1-  संवेदनशीलता

जब हम हर स्थिति में खुद से प्यार करते है, तो हम यह सीखते है कि कब हम सर्वश्रेष्ठ होते है। हम अपने और दूसरों के प्रति भी अधिक सवेंदनशील बनते है और और अतीत के फैसलों के आधार पर खुद को आंकना बंद कर देते है। अपनी गलतियों से हम सीखते है और आगे बढ़ जाते है। हमारे लिए life के बदलाव को accept करना ज्यादा आसान हो जाता है।

2-  मजबूती

पल-दर-पल सच्चा होना हमें साहसी और दिलेर बनाता है। जब चुनौतियों आती है, तो हम बेशक दबाव महसूस कर सकते है, लेकिन उसका सफलतापूर्वक सामना भी करते है। क्योंकि हमने यही सीखा होता है कि अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए खुद पर भरोसा रखना चाहिए, फिर चाहे हम success हो या unsuccess!

3-  निश्चितता

जब हम अपने सच्चे स्व को व्यक्त करने लगते है, तो tension कम होने लगती है और कठिनाईयों को परे झटकना शुरू कर देते है। खुद को कोसना समय के साथ कम होने लगता है और future को लेकर हमारी आंशकाएं छीजने लगती है। हम present में सहज होने लगते है और अतीत को आस-पास फटकने नही देते। हमारा पूरा ध्यान वर्तमान पर होता है, जिससे हमें निश्चितता मिलती है, फिर परिस्थिति कैसी भी रहे।

4-  Positivity

भीतरी आवाज पर भरोसा करते ही दूसरों के साथ हमारे रिश्ते बदलने लगते है। हम अपने आस-पास उन लोगों को महसूस करने लगते है, जो मदद को हमेशा तैयार रहते है या हमें प्रोत्साहित करते है। हम ऐसे लोगों के साथ ज्यादा वक्त नही बिताते, जो हमारी energy बर्बाद करते है। हम उनकी तरफ attract होने लगते है, जो हमें सर्वश्रेष्ठ बनने को प्रेरित करते है।

5-  जरूरतों को पूरा होना

खुद के प्रति सच्चे होते ही हमारा life सुखद होने लगता है। हमारी जरूरतें पूरी होने लगती है, क्योंकि हम जो कुछ कर रहे होते है, उस पर हमें भरोसा होता है। हम जानते हैं कि हमें खुश रहना चाहिए। इससे हमारा अपने सपनों पर विश्वास बढ़ता है।

आत्म-सम्मान पैदा करने की सोच

1-  कोई person, place या कोई चीज तब तक हम पर हावी नही हो सकती, जब तक हम उसे ऐसा करने की अनुमति नही देंगे।
2-  मैंने भले ही अतीत में बुरे option अपनाये है, लेकिन इसका मतलब यह नही है कि मैं बुरा आदमी हूँ, और न ही मैं इस option में फंस गया हूँ।
3-  मेरे पास जो कुछ नही है, उसकी complain करना बेशक स्थिति संभालने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन इससे कुछ बदल नही सकता।
4-  जब मैं खुद से प्यार करता हूँ, तो negative परिस्थिति में यह कह सकता हूँ कि मैं अपनी चेतन अवस्था में उन वजहों से मुक्त होने को तैयार हूँ, जिनसे यह परिस्थति पैदा हुई है।
5-  खुद या दूसरों से complain पालने की बजाय life को positive तरीके से देखने का option मैं चुन सकता हूँ।
6-  मैं पुराने फैसलों से मुक्त हो सकता हूँ और बिना शर्त खुद से प्यार करता हूँ।
7-  यह आजादी मुझे हासिल है कि मैं क्या सोच सकता हूँ।

आत्म सम्मान पैदा करने की तीन आदतें

1-  पहली है, diary लिखना। diary में अपने experience को लिखें। यह लिखें कि उनसे आपको कैसा लगा और क्या आपको यह लगता है कि अंतरात्मा ने जैसा कहा, उसी तरह आपने उनसे निपटने की कोशिश की? अगर आप किसी बात को लेकर परेशान हैं, तो क्या आपने उसका सामना किया या उसे छिपाया? जितना अधिक आप diary लिखेंगे और यह यह पता करने की कोशिश करेंगे कि आपने कब अपना सर्वश्रेष्ठ दिया, तो उतना अधिक आप सच को व्यक्त करने के करीब पहुंचने लगेंगे।
2-  दूसरी है, ध्यान लगाने का अभ्यास करना। अपने विचारों को संयत रखने का इससे बेहतर कोई दूसरा तरीका नही है। इससे आत्म-सम्मान एक habit में ढल जाता है, और आप हर दिन खुद से प्यार करने का अभ्यास करने लगते है।
3-  तीसरी है, सुनने का अभ्यास करना। अपने अंतनिर्हित भय को व्यक्त करने का बेहतर उपाय है, अपने भीतर झांकना और अपनी सच्ची भावनाओं को व्यक्त करना। ऐसा करने के डर से मुकाबला करना भी आसान हो जाता है। कई लोग सोचते है कि आत्म-सम्मान सबसे शक्तिशाली औजार है। यह वाकई है, लेकिन तभी, जब आप इसको सुनने और समझने से जोड़ देते है।